About Uttarakhand |उत्तराखण्ड का इतिहास | टिहरी रियासत | Education in Hindi
About Uttarakhand | उत्तराखण्ड का इतिहास | टिहरी रियासत
Education in Hindi
प्रारम्भिक इतिहास1815 टिहरी एक छोटी सी बस्ती के रूप में विकसित हुई थी। जिसमें करीब 8 या 10 परिवार पर रहते थे। इनका मुख्य व्यवसाय तीर्थ यात्रियों तथा अन्य लोगों को नदी पार कराना था। इस बस्ती को मुख्यतः धुनारों की बस्ती कहा जाता था। इस बस्ती का विकास कैसे हुआ यह तो कोई नहीं जानता लेकिन 17 वीं शताब्दी में पंवार वंश के राजा महीपति शाह के सेनापति रिखोला लोदी के इस बस्ती में एक बार पहुंचने का उल्लेख इतिहास में मिलता है। टिहरी रियायत का उल्लेख स्कंदपुराण के केदारखंड में भी है जिसमें इसे गणेश प्रयाग अलवर धनुष तीर्थ कहा गया है।
आधुनिक इतिहास
आधुनिक इतिहास की बात करें तो यह ऐतिहासिक रूप से यह 1815 में चर्चा में आया जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता से गढ़वाल के राजा सुदर्शन शाह गोरखों के हाथों 1803 में गवां चुके अपनी रियासत को वापिस हासिल करने में सफल रहे। लेकिन अंग्रेजों ने चालाकी से श्रीनगर गढ़वाल व अलकनंदा पार का समस्त विशेष क्षेत्र हड़प किया।
गोरखों का इतिहास
गोरखों ने गढ़वाल में सबसे पहले 1791 में आक्रमण किया था लेकिन वे असफल रहे। वर्ष 1803 में गढ़वाल क्षेत्र में भूकंप आने के कारण गोरखों ने एक बार फिर गढ़वाल क्षेत्र पर आक्रमण किया और गढ़वाल को अपने कब्जे पर ले लिया। वर्ष 1804 में देहरादून की खुड़बुड़ा के मैदान में गोरखों और सुदर्शन शाह के पिता प्रद्युम्न के बीच युद्ध हुआ जिसमें प्रद्युम्न शाह वीरगति को प्राप्त हो गए। और यह पूरा क्षेत्र गोरखों के अधीन हो गया ।
सुदर्शन शाह [1815-1859]
तत्पश्चात 1815 में करीब करीब 12 वर्ष के बाद सुदर्शन शाह ने अपनी रियासत को प्राप्त करने के लिए अंग्रेजों की मदद ली और इस क्षेत्र पर अपना अधिकार किया। एक किवदंती के अनुसार टिहरी के कालभैरव ने उनकी शाही सवारी रोक दी और यहीं पर राजधानी बनाने को कहा। 28 दिसंबर 1815 को सुदर्शन शाह ने टिहरी पर विधिवत रूप से गढ़वाल रियासत की राजधानी स्थापित कर दी।
रियासत की आर्थिक स्थिति
तब यहां पर धुनारों के मात्र 8-10 कच्चे मकान ही थे। राजकोष लगभग खाली था। एक ओर रियासत को व्यवस्था पर लाना व दूसरी ओर राजधानी के विकास की कठिन चुनौती। 700 रु में राजा ने 30 छोटे-छोटे मकान बनवाये और यहीं से शुरू हुई टिहरी के एक नगर के रूप में आधुनिक विकास यात्रा। राजमहल का निर्माण भी शुरू करवाया गया लेकिन धन की कमी के कारण इसे बनने में पूरे 30 साल लग गए। इसी राजमहल को पुराना दरबार के नाम से जाना गया। टिहरी की स्थापना अत्यन्त कठिन समय व रियासती दरिद्रता के दौर में हुई। तब गोरखों द्वारा युद्ध के दौरान रौंदे गये गांव के गांव उजड़ गए थे। फिर भी टैक्स लगाये जाने शुरू हुए। जैसे-जैसे राजकोष में धन आता गया टिहरी में नए मकान बनाए जाते रहे। शुरू के वर्षों में जब लोग किसी काम से या बेगार ढ़ोने टिहरी आते तो तम्बुओं में ही रहते थे।
धन पूर्ति की शुरुआत
सन् 1858 में टिहरी में भागीरथी पर लकड़ी का पुल बनाया गया इससे आर-पास के गांवों से आना-जाना सुविधाजनक हो गया। 1859 में अंग्रेज ठेकेदार विल्सन ने रियासत के जंगलों के कटान का ठेका जब 4000 रु. वार्षिक में लिया तो रियासत की आमदनी बढ़ गई। 1864 में यह ठेका ब्रिटिश सरकार ने 10 हजार रु. वार्षिक में ले लिया। अब रियासत के राजा अपनी शान-शौकत पर खुल कर खर्च करने की स्थिति में हो गये।
सुदर्शन शाह की मृत्यु
वर्ष 1859 में करीब 44 सालों तक टिहरी पर शासन करने के बाद सुदर्शन शाह की मृत्यु हो गयी। इसके बाद उनके पुत्र भवानी शाह टिहरी की राजगद्दी पर बैठे। राजगद्दी पर विवाद के कारण इस दरम्यान राज परिवार के ही कुछ सदस्यों ने राजकोष की जम कर लूट की और भवानी शाह के हाथ शुरू से तंग हो गये।
भवानी शाह [1859-1871]
भवानी शाह ने मात्र 12 साल तक गद्दी सम्भाली। भगवानी शाह के समय में हिंदी में कागज बनाने का कारोबार शुरू हुआ। और यह इतना बढ़ गया कि अंग्रेज अधिकारी भी यही पर कागज खरीदने लगे। भवानी शाह के शासन के दौरान टिहरी में कुछ मंदिरों का पुनर्निर्माण किया गया व कुछ बागीचे भी लगवाये गये।
प्रताप शाह [1871-1887]
1871 में भवानी शाह के पुत्र प्रताप शाह टिहरी की गद्दी पर बैठे। भिलंगना के बांये तट पर सेमल तप्पड़ में उनका राज्याभिषेक कराया गया। उनके शासन मे टिहरी में कई नये निर्माण हुए। पुराना दरबार राजमहल से रानी बाग तक सड़क बनी, कोर्ट भवन बना, खैराती सफाखान खुला स्थापना हुई रियासत के पहले विद्यालय प्रताप कॉलेज की स्थापना जो पहले प्राइमरी व फिर जूनियर स्तर का उन्हीं के शासन में हो गया। राजकोष में वृद्धि हुई तो प्रतापशाह ने अपने नाम से 1877 में टिहरी से करीब 15 किमी पैदल दूर उत्तर दिशा में ऊंचाई वाली पहाड़ी पर प्रतापनगर बसाना शुरू किया। इससे टिहरी का विस्तार कुछ प्रभावित हुआ लेकिन टिहरी में प्रतापनगर आने-जाने हेतु भिलंगना नदी पर झूलापुल (कण्डल पुल) का निर्माण होने से एक बड़े क्षेत्र (रैका-धारमण्डल) की आबादी का टिहरी आना-जाना आसान हो गया। नदी पार के गांवों का टिहरी से जुड़ते जाना इसके विकास में सहायक हुआ। राजधानी तो यह थी ही साथ ही साथ अब व्यापार का केन्द्र भी बनने लगी।